‘सन्नाटा’

कुछ महसूस किया मैने,
उस सुनसान दोपहर में,
किसी पेड़ के छाव मे,
अपनी डायरी, कलम लिए,
यूँहीं कुछ अजिबो-गरीब शब्दो का खेल खेल रहा था।
हल्के बुंदे पसीनो के, माथे पर निकल आएं।

ना कोई शोर, ना कोई शराबा।
बस एक ‘सन्नाटा’ था।
न जाने क्यों ऐसा लगा,
जैसे वो ‘सन्नाटा’ भी कुछ कहना चाहता हैं मुझसे।
मैने भी समझने कीं कोशिश किया,
पर ना समझ पाया।

हल्के झरोखे, कुछ चहचहाना पंछीओ का,
वह पत्तियों के हिलने कीं आवाज,
एक अजिब सा एहसास करा रहा था।

-कमलेश बिश्वास

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