मै कौन हु!

खोला हुआ खुशनुमा बादल हु मै,

मै नदी का तेज बहाव हु,

मै कैद नहीं हु ऐ अलमदद,

मै परिन्दे की उड़ान हु।

 

चंगेज़ का जहाज़ हु,

मै चील का शिकार हु,

मेरे शौख सौ जहान से,

मै अल्लाह की पुकार हु।

 

तारीफे भी तेरी,

लतीफ़े भी तेरी,

मै एक नदी का फ़ुहार हु,

 

मै दर्द हु, मै दवा भी

मै बारिश भी, मै छाता भी,

मै ही तो हु इस जहान मे,

मै शाम की अजान मे,

मै कतरा कतरा बह गया

एक बाढ़ सा उजाड़ मै।

 

संगीत मै, तालीम भी,

रियाज़ भी मै, अजान भी,

मै तो अनहद नाद हु,

मै तानसेन का राग भी।

 

मै रेल की रफ्तार हु,

मै चींटी का कतार हु,

मै लहर हु समंदर की,

मै शेर का दहाड़ हू।

 

उलझी हुई गुत्थी भी हु,

सहज सरल सवाल भी,

मै प्रेम हु, मै भाव हु,

मै ज्ञान का भंडार हु,

अंधेरा हु मै रात सा,

सूरज सा जलता आग भी।

 

मै जुगनू का टिमटिम भी हु,

मै आग का लपेट भी,

मै प्रारंभ हु, अखंड हु,

मै टेढ़ी-मेढ़ी राह भी।

 

मै अधूरा हु, कोई कहानी सा,

मै पूरी लिखी किताब भी।

 

मै जन्म हु, मै अंत भी,

मै एक नारी का श्रृंगार भी

मै कोई पड़ा पत्थर भी हु,

हातों से फिसलता रेत भी।

 

“मै तो ना तू हु,

ना तेरी जहान हु,

न तेरे ही राह का मात हु,

“वजूद” का भूखा हु मै,

मै अपना ही गुमान हु।”

 

© कमलेश बिस्वास

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‘सन्नाटा’

कुछ महसूस किया मैने,
उस सुनसान दोपहर में,
किसी पेड़ के छाव मे,
अपनी डायरी, कलम लिए,
यूँहीं कुछ अजिबो-गरीब शब्दो का खेल खेल रहा था।
हल्के बुंदे पसीनो के, माथे पर निकल आएं।

ना कोई शोर, ना कोई शराबा।
बस एक ‘सन्नाटा’ था।
न जाने क्यों ऐसा लगा,
जैसे वो ‘सन्नाटा’ भी कुछ कहना चाहता हैं मुझसे।
मैने भी समझने कीं कोशिश किया,
पर ना समझ पाया।

हल्के झरोखे, कुछ चहचहाना पंछीओ का,
वह पत्तियों के हिलने कीं आवाज,
एक अजिब सा एहसास करा रहा था।

-कमलेश बिश्वास

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नई शुरुआत

नई शुरुआत

अजीब सी शुरुआत है इस नए साल के आने मे,
कुछ पलो को भुलाने में, कुछ चीजों को आजमाने में।
पुरा साल बित जाता हैं एक छोटा कदम बढ़ाने में।

ज़िद्द भी जब उलझ जाती हैं, खुद को ठहराने में।
चांदनी भी कतराती हैं, खुद को फैलाने में।
उम्मीद भी मुंद लेती हैं आंखे, दिलासा के बहाने मे।
पुरा साल बित जाता हैं एक छोटा कदम बढ़ाने में।

सोच कीं चुप्पी सताती हैं, अलफाजो को उतराने में।
रूठ जाती हैं आंखे जब, सच को निहारने में।
अश्क भी कहते हैं जब, आती है शर्म बाहर आने में।
पुरा साल बित जाता हैं एक छोटा कदम बढ़ाने मे।

डर भी जब खुद घबरता हैं, तस्वीरो को स्वीकारने मे।
खामोश हैं गुदगुदी भी महसूस कराने में।
बस एक प्रेम हीं तो हैं, जो चला है और चलता जाएगा,
हर एक साल के जानें में, और एक साल के आने में।
पुरा साल बित जाता हैं एक छोटा कदम बढ़ाने में।

नई किस्मत जब ताकेगी, तो शायद स्वर्ण अक्षरों मे ऑखेंगी।
नया साल है यह तो नई उम्मीद भी जागेगी।
नम ऑखो से जब हम इस दुनिया को देखेंगे, उम्मीद हैं वह आँसू खुशी के कहलाएगी।

अजिब सी इस शुरुआत को खूबसूरत बनाना चाहता हूँ।
नए साल के इस शुरुआत को, मैं हसीन बनाना चाहता हूँ।
इस साल ईश्वर हिम्मत दे मुझके इतनी, इस साल को मै जिंदगी का चिन्ह बनाना चिहता हूँ।।

-कमलेश बिश्वास

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